कभी आसमान की तरफ देखकर मन करता है कि काश हम भी बादल बनकर उड़ पाते—बेफिक्र, आजाद और हर रंग में ढले हुए। कविता “Baadal Ban Udata Phiru” उसी imagination और freedom of soul को शब्दों में पिरोती है। यह poem बादलों के playful nature, उनकी mystery और मौसम से जुड़े emotions को बेहद soft और dreamy अंदाज में सामने लाती है।
बादल बन उड़ता फिरूं ………….

मैं बादल बन उड़ता फिरूं
बादल बन मैं सूरज को भी ढकूं
कभी श्याम – कभी श्वेत
मैं अनेको रंगो में सजूं
दिन हो या रात
सारे गगन की मैं सैर करूं
मैं बादल बन उड़ता फिरूं
मैं हवाओं के संग – संग उडूं
मैं जल – अग्नि को भी समेटे ले चलूं
मेरा आना कभी लगे डरावना
कभी मुझे देखते ही मौसम हो जाए सुहावना
मैं बादल बन उड़ता फिरूं
नये- नये मैं खेल रचूं
देखो मैं बादल बन उड़ता चला…………
सुरेश के
सुर……….
Fly like a cloud…………

I will fly like a cloud.
Let me become a cloud and
cover the sun.
Sometimes black – sometimes white,
I dress up in many colors.
Day or night,
I will travel across the sky.
I will fly like a cloud.
I fly with the wind.
I can carry water and fire
along with me………..
My arrival sometimes seems scary,
sometimes the weather becomes
pleasant as soon as you see me.
I will fly like a cloud.
I create new games…………
Look,
I am flying like a cloud…………
Suresh Saini
अगर आप भी nature की beauty में खो जाना पसंद करते हैं और मन में कहीं एक free-spirit जिन्दा है, तो यह कविता आपको आसमान के और करीब ले जाएगी।
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