“बहुरानी बनने चली राजरानी” एक sharp और relatable vyangya kavita है, जो घर-परिवार के छोटे-छोटे ego clashes और emotional drama को बड़े ही witty अंदाज में सामने लाती है।
इस कविता में कोप भवन, सास-ननद और ‘महाशय जी’ जैसे किरदारों के जरिए आज के घरेलू माहौल की irony को mirror किया गया है। हल्की हँसी के साथ यह रचना हमें सोचने पर भी मजबूर करती है।
बहुरानी बनने चली राजरानी………..

बात – बात में कोप भवन में जा बैठे बहुरानी
बोले अब ‘मैं’ बनूंगी राजरानी
बहुत सह लिया
अब ना करूंगी ‘मैं’ गुलामी
बात – बात में कोप भवन में जा बैठे बहुरानी
क्या कहेगी ‘सास’
क्या कर लेगी मेरा, ननद – देवरानी
बात – बात में कोप भवन में जा बैठे बहुरानी
बात अपनी – अपनी सबने समझा दी
पर जिद पे अड़ी थी बहुरानी
जब ‘महाशय जी’ पहुंचे कोप भवन
बहुरानी ने झूठी प्रीत दिखा दी
बात – बात में कोप भवन में
जा बैठे बहुरानी…………..
सुरेश के
सुर…………
Bahurani becoming the Rajrani……….

The Bahurani started
becoming the Rajrani.
Bahurani sits down in Kop Bhawan
while talking.
‘I’ will become the queen,
endured a lot, now I will not do slavery.
Bahurani sits down in Kop Bhawan
while talking.
What will ‘Saas’ say?
What will ‘Nanad’ and ‘Devrani’ do?
Bahurani sits down in Kop Bhawan
while talking.
Everyone explained their thing
but the Bahurani was immovable.
When ‘Mahashay Ji’ reached
Kop Bhawan, the Bahurani
showed false love.
Bahurani sits down in Kop Bhawan
while talking……………
Suresh Saini
यह कविता सिर्फ हँसाती नहीं, बल्कि रिश्तों की reality पर एक gentle सवाल भी उठाती है।
अगर आपको satire, irony और social vyangya पसंद है, तो “बहुरानी बनने चली राजरानी” आपको जरूर connect करेगी।
कविता पढ़कर अपनी राय Share करें और बताइए—क्या आपने भी ऐसी कोई “राजरानी” अपने आसपास देखी है?
आज के बदलते समय में बच्चों की मासूमियत कहीं खोती सी नजर आती है। मोबाइल, सोशल मीडिया और बड़ों जैसी सोच ने बचपन को समय से पहले बड़ा कर दिया है। इसी कड़वे सच को हल्के व्यंग्य और गहरी संवेदना के साथ बयान करती है कविता “बच्चे अब बच्चे नहीं रहे” , जो मुस्कराते-मुस्कराते सोचने पर मजबूर कर देती है। इस प्रभावशाली व्यंग्य कविता को जरूर पढ़िए और आज के बचपन की सच्चाई को महसूस कीजिए।